रोमिया के महतारी को ख़त—————- बेरोजगारी, पलायन और विरह की कहानी

रोमिया के महतारी,

अपने मनसेधू के माफ़ कर दीजियेगा। हम ई बार फ़िर नहीं आ सके। मालिक कहता है कि इहे सब त्यौहार तो दुकान के बरे मानसून है। सारे ग्राहक इहे दिनन म ख़रीददारी करे बाटे दुकान आते हैऔर तुम्हें इन्ही दिन छुट्टी चाहिए।

ज्यादा जोर डाले तो ठिठोली कर दिया कि पांच गो बच्चा पैदा कर दिए, अब भी तुम्हें बीवी को प्यार करना है। हम लजा के कह दिए भक्क बाबू ज़ी, उ ढेर दिन हो गया है, इसलिए जाना चाहते है। तो अपनी जुबान के चौथे गियर में धर के बोला कि जाओ लेकिन वापस लौट के न आना। हम डर गए और छुट्टी के पिलान कैंसिल कर दिए।

ग्राहक को कपडा दिखा रहे है, मगर मन तुम्हारी पियरी में लगा है। जो तुमको देने के बरे रखे थे। केतना नीक लगती तुम, जो उसे पहनती, जैसे सरसों के फूल। और हमनी सब गाना गाया जाता, ‘हम हई पिया जी के पतरी तिरिंगवा’। हिया ई साले मलिकवा ने दर्द जुदाई का दे दिया।

हम सोचते है कि अपने पास भी एक 10 मंडा चक होता, तो काहे आज परदेश ई एनोडा-एनोडी म आना पड़ता। पुरखा लोग से कुछो विरासत म मिला तो उ सूत मिला था। सूत चुकाते-चुकाते आधे हो गए तो फ़िर हिया भाग आये। ख़ैर, ई शहर असरा दिया, दू जून की रोटी दिया और एतना भर धन दे देता है कि उ बनिया का सूत अधिया दिए है और बाबू-बबुनी लोग को इस्कूल भेज ले रहे है।

रोमिया,पिंटू,रम्मू,बुच्चा और रेनी सब कुशल मंगल से होइबे करिहे। रम्मू तो खूब बड़ा हो गया होगा। ई बेरी उसका 10+2 है न। कह दिया कि दौड़ब स्टार्ट कर दें, मिलिटरी म जाना है न उके। नहीं तो हमरी मतिंग हिया सब लोग के कपडा दिखैहे। और उससे ऊपर विरह की अग्नि म हमेशा झुराया करिहे। न घर का सुख, न लेरका का सुख। हाय पैसा-हाय पैसा।

टेसुआ के लोर के साथ
जोखन लाल,
बवाना मैचिंग स्टोर
एनोडा से

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मैं जीवन॥ को अभी समझ ही रहा हूँ..........

One Response

  1. Gopal
    Gopal at | | Reply

    बहुत बढ़िया पोस्ट सर ! मै आपका बड़ा फैन हु आपकी प्रत्येक नई पोस्ट ध्यान से पढना हु, यह कहने में मुझे कोई हर्ज नही हैं. आपकी वेबसाइट नवींन ज्ञान और अच्छे पाठक अनुभव से इंडिया की सबसे बेहतरीन वेबसाइट में से एक हैं. मैंने भी आप से प्रभावित होकर एक ब्लॉग स्टार्ट किया हैं. मेरे ब्लॉग का पता हैं, हैं. एक बार कृपा कर जरुर देखे और कुछ सुझाव दे. सर
    http://www.hihindi.com

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