ई सभासदी के चुनाव है राजा!

ई सभासदी के चुनाव है राजा!

चुनाव की तारीख़ की घोषणा हो चुकी है। प्रत्याशियों ने प्रचार की करधनी कस ली है। दीवारें पोस्टरों से रंग चुकी है, बिजली के खंभे बैनरों से सज चुके है। जिधर देखो, उधर कोई न कोई हाथ फैलाये मने हाथ जोड़े नजर आ रहा है। कर्मठ, संघर्षशील, आपका अपना फलाने, युवा जोश और कट्टर इरादों संग ढेमका को जिताइये, जीत हमारी आदत है जैसे स्लोगन हर गली-मोहल्ले में चीख रहे है।

छोटे शहरों में एकाध बड़ी फैक्ट्री होती है, सो उसके रिटायर्ड कर्मचारी या उनके छेटी पोटा चुनाव लड़ते है तो वो इस समीकरण पे सबसे अधिक जोर देते है। अपनी फैक्ट्री के कर्मचारियों की बाकायदा लिस्ट निकालते है और उनसे एकदम अपीली अंदाज में कहते है कि ऑफिस की नाक का सवाल है, एक बार जिता दियो, नाली से लेकर मर्करी तक सारी समस्या सुलझा देंगे।

नंबर दो समीकरण जिसे हिंदुस्तान की राजनीति का डीएनए भी कहा जा सकता है, उ है जाति का समीकरण। वो इस चुनाव में भी छम्मा-छम्मा करता है। प्रत्याशी वोटर को अपनी जाति का वास्ता देता है और कहता है कि खोये हुए गौरव को वापस पाने के लिए और अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए अपना वोट हमें बेच दीजिये वोट फॉर कॉस्ट के नाम पर।

खँडहर पहुँच गयी रिश्तेदारी ख़ोज निकाली जाती है। विदेश में सॉफ्टवेयर की वेल्डिंग कर रहे दामाद अपने ससुर को फ़ोन करके कहते है कि पापा मंटू राजा को वोट दीजियेगा, बड़ा भला आदमी है, अपने उत्सव लॉन में उन्होंने हमें तिलक के समय पूरे दस हज़ार की छूट दी थी।

मोंटी बाबू ने शिवम की पुछियल एक बार काट दी थी और शिवम हरबद्दी में मुंह की खा गया था। इसलिए उसने फैसला किया है कि इस बार उ टुन्ने को न सिर्फ वोट देगा बल्कि उसका फुल सपोर्ट भी करेगा। लंका पार्क का माँ भगवती पंडाल इस बार विश्राम पार्क से ऊँचा था ,सो विश्राम पार्क की दुर्गा पूजा पंडाल के आयोजक रिद्धमान ने लंका पार्क के कीर्तिवर्धन के प्रत्याशियों को हराने के लिए अपने सारे घोड़े खोल दिए है।

अच्छा प्रत्याशी लोग इतने चंट है कि उन्हें पता है कि कौन उनका वोटर है और कौन उन्हें फूटी आँख भी नहीं देखता। ऐसे में अगर वो रास्ते से गुजर रहे है और दो दोस्त जा रहे है तो वो अगले को नजरअंदाज करते हुए अपने वोटर से कहेंगे कि फलां तारीख को नामांकन है, पहुँचना है और हाँ तुम मेरे सबसे मजबूत कार्यकर्त्ता हो। अब वो लड़का सोच रहा है कि साला हम पांचवे-सांतवे जुम्मे पे इनसे मिलते है, इनकी मजबूती कैसे हो गए इतने में ही, अंबुजा सीमेंट कही हम ही तो नहीं है।

आँखों देखा हाल कहने वाला स्वयंभू पत्रकार,
संकर्षण शुक्ला,
B 670
आवास विकास
इंदिरा नगर
रायबरेली से।

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मैं जीवन॥ को अभी समझ ही रहा हूँ..........

2 Responses

  1. RC Mishra
    RC Mishra at | | Reply

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