सफर-ए-खंचड़िया

 

ट्रेनों के रद्द होने और बची ट्रेन की तत्काल कन्फर्म न होने के बाद आशा की एकमात्र किरण उत्तर प्रदेश परिवहन की सरकारी बसें थी। बस कैसी भी हो अगर उस पर यूपीएसआरटीसी लिखा है तो उनकी कार्यप्रणाली में बालू के कण जितनी भी असमानता नहीं होगी। सो हमारी बस ने भी अपनी व्यवस्था की वर्षो पुरानी परम्परा को बड़ी शिद्दत से निभाया।

सबसे पहले तो हमारे जिले के बस स्टेशन पर अपार विलम्ब के साथ पहुंची और पहुंची भी तो अपने संग महा कुम्भी भीड़ लेकर। किसी तरह हम चढ़ने को पा गए मगर सामान अभी भी नीचे था। खैर! सामान को तो साथ आये भाई ने किसी जतन से ऊपर ठंसवा दिया। अब हमारे बगल एक अंकल जी विराजित थे जो हमारी जगह पे बैठने के लिए आतुर थे। सरकारी बसों में विंडो सीट पहले आओ, पहले कार्यक्रम के तहत मिलती है। अब अंकल जी ने अपनी बढ़ती उम्र को भुनाने की कोशिश की। एक-दो बार बनावटी तरीके से खों-खों खाँसे भी मगर अब हम भी गुरु है, झूठो कह दिए कि हमारा जी मिचलाता है बीच-बीच में।

अभी कुछ दूर पहुंचे ही थे कि बस पंचर हो गयी। अच्छा बस को भी ड्राइवर ने उसी ढाबे पे पंचर किया जहाँ उसका चाय-पानी बंधा है। चूँकि दूरी अभी नाममात्र की ही थी, सो अकारण रोकने पे जागरूक किस्म के यात्री ग़दर काट देते इसलिए पंचर को सहारा बनाना पड़ा कर्मठ कंडक्टर और ड्राइवर को। वहां से निकले ही थे कि फूलों से भरे तीन-चार बोरे लेकर तहमद-बनियान पहने दो-तीन जन बस में दाखिल हो गए और उसी ड्राइवर ने उनका पूरा सामान बस में एडजस्ट करवा दिया जो अभी तक बाक़ी यात्रियों की जरा सी अटैचियों को चालीस किलो से ऊपर बताकर उसका अलग से पैसा जोड़ रहा था , कारण कि ये फूल उनके जीवन में गाँधी जी वाली सरकारी फोटो की महक बिखेरने वाले थे । शायद इन ड्राइवरों-कंडक्टरों की आँखों में तौल मशीन फिट रहती है जो ये सामान देखते ही उसका वजन बता देते है और फिर यात्रियों से औकात के अनुसार शीत और मल्ल युद्ध लड़ते है। जीतने पे कुछ चाय पानी का खर्चा, हारने पे गाली और कभी-कभी लप्पड़ भी पा जाते है।

कारवां बढ़ता जा रहा था बिल्कुल जनवांसी चाल के साथ। इसी बीच ड्राइवर महोदय ने २-३ ढाबे में २-२ घंटो के अंतराल पे गाड़ियां रोकी मानो यात्री जन्म-जन्मांतर के भूखे हो। एक जनी एक टिकट लेकर अपनी बिटिया को भी बगल में बिठाई थी मने एक और सीट मुफ्त में अधिगृहीत की थी। अब कंडक्टर साहब के पार्श्व में एक दादा जी बैठे थे, जिन्हें टिकट बाबू कही और शिफ्ट करना चाहते थे। सो पीछे वाली महिला को कानूनपट्टी पढ़ाने लगे। महिला भी सांगीपुर की थी, टस से मस न हुई। हारकर कंडक्टर बाबू अपनी जगह पे सिकुड़ कर दादा जी को फैलहर कर दिए।

बढ़ती तकनीक ने हर आदमी की जेब में मुशायरा, संगत, गाने ला दिए और हर आदमी जब तब इसका मुजाहिरा भी किया करते है। सो आगे वाली सीट पे मुरैठा बांधे एक सज्जन भोजपुरी में जवानी छलका रहे थे। तो पीछे से हरियाणवी में तू चीज लाजवाब घमघमा रहा था, जिसे जौनपुर के बिशुन राजभर देख रहे थे, लिरिक्स से उन्हें मतलब नहीं है, उन्हें तो बस गाणा सपना का ही सुनना है। चूँकि ड्राइवर बाबू पेन ड्राइव लाना भूल गए थे, सो किसी ऐसे बन्दे की तलाश में थे जो उनकी फरमाइश पे निर्गुण-विदेशिया-सोहर चला दें। एक लड़का काफी देर से सीट को इधर-उधर ताक रहा था, जिस पर ड्राइवर साहब की पारखी नजरें इनायत हो गयी और ड्राइवर बाबू ने उस लड़के को इसी शर्त पे अपने बोनट पे बिठाया कि वो जिओ सिम वाले मोबाइल से गाना डॉट कॉम पे उनकी पसंद के निर्गुण आदि लगाएगा।

उधर एक ऑन्टी जी बीच-बीच में तमतमा जाती थी, कारण उनके बगल में बैठे साठा पे पाठा वाली नौजवान प्रजाति के अधिनायक महोदय का बीड़ी सुलगाना था।आइंस्टीन के बाद खुद को सर्वाधिक बुद्धिमान मानने वाले प्राणी ने टिकट कि फोटो लेकर बेफिक्री में उसे फेंक दिया और फिर जब सुबह में कंडक्टर से पैसे वापस लेने कि बारी आयी तो फोटो दिखा रहे है मगर कंडक्टर ने साफ़ मना कर दिया फोटो देने से क्योंकि वैसाखनंदन ने बकाया धनराशि वाली तरफ का चित्र नहीं लिया था।

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मैं जीवन॥ को अभी समझ ही रहा हूँ..........

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